यह भावनात्मक कविता 'विश्वासघात' के गहरे और अमिट दर्द को दर्शाती है। कवि उन ज़ख्मों का वर्णन करता है जो अपनों द्वारा दिए गए धोखे से मिलते हैं, ऐसे ज़ख्म जो समय के साथ भी नहीं भर पाते। हर रात [शब|रात] उस पीड़ा में दिल रोता है, यह दर्शाता है कि विश्वासघात का घाव कितना गहरा होता है। जिन पर हमने [एतबार|विश्वास] किया, जब वही बेवफ़ा निकलें, तो सपनों का महल पल भर में बिखर जाता है। आँसुओं की बारिश होती है और हर दुआ रूठ जाती है, क्योंकि इस आघात से इंसान की आस्था डगमगा जाती है। कवि कहता है कि अब हर [अज़ीज़|प्रिय] चेहरा भी एक सज़ा सा लगता है, क्योंकि भरोसे का धागा एक बार टूटने पर हर रिश्ते पर संदेह की छाया पड़ जाती है। यह कविता उस मानसिक स्थिति को उजागर करती है जहाँ व्यक्ति अपनी ही परछाईं पर भी भरोसा नहीं कर पाता, क्योंकि धोखा इतना गहरा होता है कि हर चीज़ संदेहास्पद लगने लगती है। यह कविता उन सभी भावनाओं का निचोड़ है जो एक विश्वासघात से उत्पन्न होती हैं - निराशा, अकेलापन और एक गहरे, अनवरत दर्द की अनुभूति।