यह ग़ज़ल मानवीय क्रोध की उस अवस्था को दर्शाती है जो बाहर से शांत दिखती है परंतु भीतर ही भीतर व्यक्ति को राख कर देती है। 'ज्वाला' शब्द क्रोध की तीव्रता का प्रतीक है, जबकि 'अहंकार' उस अहंकार को दर्शाता है जो हमें दूसरों से दूर और खुद को विनाश के करीब ले जाता है। क्रोध एक ऐसी अग्नि है जो जलाने वाले को ही पहले भस्म करती है। इस कविता का उद्देश्य यह समझाना है कि क्रोध का परिणाम केवल पछतावा होता है। यह रचना उन लोगों के लिए है जो अपने भीतर दबे हुए आक्रोश को शब्दों के माध्यम से मुक्ति देना चाहते हैं।