यह कविता उस गहरे विरह और अकेलेपन को दर्शाती है जो किसी प्रियजन के दूर जाने पर महसूस होता है। यहाँ 'तसव्वुर' शब्द का प्रयोग कल्पना की गहराई को दिखाने के लिए किया गया है, जहाँ यादें ही एकमात्र सहारा रह जाती हैं। यह रचना उन लोगों के लिए है जो अपनी तन्हाई में भी किसी की मौजूदगी का अहसास ढूंढते हैं। विरह की यह अग्नि मन को 'मदहोश' कर देती है, जिससे वास्तविकता धुंधली पड़ जाती है।

इस कविता में विरह की उस अवस्था को दर्शाया गया है जहाँ दूरियां होने के बावजूद प्रेम की तीव्रता कम नहीं होती। 'नूर' यहाँ उस आशा की किरण को दर्शाता है जो यादों के रूप में जीवित है। 'मजबूर' शब्द का प्रयोग उस विवशता के लिए हुआ है जहाँ शब्द कम पड़ जाते हैं और खामोशी ही सब कुछ कह जाती है। यह रचना प्रेम और वियोग के अनूठे मिलन का प्रतीक है।