दर्द-ए-फ़ुरक़त
Ghazal — By Furkan S Khan
Kaafiya: सहा, पिया, रहा, कहा, बहा, गुज़रा | Radeef: नहीं जाता
ये कैसा दर्द है जो अब सहा नहीं जाता,
ग़म-ए-फ़ुरक़त का ज़हर अब पिया नहीं जाता।
तेरी यादों में मेरा दिल कहीं रहा नहीं जाता,
जो कहना था तुझसे अब वो कहा नहीं जाता।
मेरी आँखों से अश्कों का दरिया बहा नहीं जाता,
क्यूँ दिल का ये हाल तुझसे कहा नहीं जाता।
हर पल ये तन्हाई का आलम है सहा नहीं जाता,
फ़ुरक़त का ये मौसम क्यूँ गुज़रा नहीं जाता।
Ghazal — By Furkan S Khan
Kaafiya: बताऊँ, बुझाऊँ, पाऊँ, सुनाऊँ, जलाऊँ, निभाऊँ, छुपाऊँ | Radeef: क्या करूँ
जो दिल में है दर्द, किसे मैं बताऊँ क्या करूँ,
हर रात अश्कों से अपनी प्यास बुझाऊँ क्या करूँ।
जो खो गया सुकून, उसे कहाँ से पाऊँ क्या करूँ,
ख़ामोश लबों से अपनी दास्तान सुनाऊँ क्या करूँ।
हर याद तेरी आग सी है जो जलाऊँ क्या करूँ,
इस बुझती शमा को मैं फिर से जलाऊँ क्या करूँ।
ये ज़िंदगी का सफ़र है, अब कैसे निभाऊँ क्या करूँ,
हर साँस में जो घुटन है, उसे कहाँ छुपाऊँ क्या करूँ।