Key Highlights
- पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट ने हिरासत में आठ साल पूरे कर लिए हैं।
- उनके परिवार ने इस पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी आज़ादी बेरहमी से छीन ली गई है।
- भट्ट 1990 के हिरासत में हुई मौत के एक मामले सहित कई कानूनी मुकदमों का सामना कर रहे हैं।
अहमदाबाद। पूर्व भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस) अधिकारी संजीव भट्ट ने अपनी हिरासत के आठ साल पूरे कर लिए हैं, जिस पर उनके परिवार ने तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की है। परिवार ने आरोप लगाया है कि उनकी 'आज़ादी बेरहमी से छीन ली गई है', जिससे उनके कानूनी संघर्ष और व्यक्तिगत पीड़ा की गाथा एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है। यह एक लंबा और थका देने वाला सफर रहा है, जहां एक परिवार अपने सदस्य की वापसी का इंतजार कर रहा है।
न्याय की पुकार: परिवार का मार्मिक बयान
भट्ट के परिवार ने इस अवसर पर एक मार्मिक बयान जारी किया है, जिसमें उन्होंने आठ साल की कैद को 'स्वतंत्रता का क्रूर हनन' बताया है। उनकी पत्नी और बच्चे लगातार न्याय की गुहार लगा रहे हैं, और उन्होंने इस अवधि को अनिश्चितता, पीड़ा और अन्याय से भरा बताया है। उनका कहना है कि यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि एक परिवार की अटूट लड़ाई है, जो हर दिन नई उम्मीद के साथ जी रहा है।
क्या है संजीव भट्ट का मामला?
संजीव भट्ट, जो गुजरात कैडर के एक आईपीएस अधिकारी थे, को 2015 में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। उनकी कानूनी परेशानियां कई वर्षों से चल रही हैं। उन्हें सबसे पहले सितंबर 2018 में एक 1996 के ड्रग प्लांटिंग मामले में गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद, जून 2019 में, उन्हें जामनगर की एक सत्र अदालत ने 1990 के हिरासत में हुई मौत के एक मामले में आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई थी।
यह मामला उस समय का है जब भट्ट जामनगर में सहायक पुलिस अधीक्षक थे। उन पर और एक अन्य पुलिसकर्मी पर एक व्यक्ति की हिरासत में मौत का आरोप लगा था। परिवार ने हमेशा इन आरोपों का खंडन किया है और इन मुकदमों को राजनीतिक प्रतिशोध का परिणाम बताया है।
कानूनी लड़ाई और अपीलें
पिछले आठ सालों में, संजीव भट्ट ने कई अदालती लड़ाइयां लड़ी हैं। उनके वकीलों ने विभिन्न अपीलों और याचिकाओं के माध्यम से उनकी रिहाई के लिए प्रयास किए हैं, लेकिन अब तक कोई बड़ी राहत नहीं मिली है। सुप्रीम कोर्ट और गुजरात उच्च न्यायालय में उनकी कई याचिकाएं या तो खारिज हो चुकी हैं या लंबित हैं। परिवार का मानना है कि इन कानूनी प्रक्रियाओं में कई अनियमितताएं रही हैं।
यह स्थिति भारतीय न्याय प्रणाली में एक जटिलता को दर्शाती है, जहां एक तरफ कानूनी प्रक्रियाएं हैं, वहीं दूसरी तरफ एक परिवार की भावनात्मक अपील। परिवार दृढ़ता से खड़ा है, हर कानूनी रास्ते का पता लगा रहा है और अपने प्रियजन की रिहाई की उम्मीद कर रहा है। उनकी आवाज़ अब भी उठ रही है, न्याय की प्रतीक्षा में।
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