Key Highlights

  • अमेरिकी संसद में भारतीय-अमेरिकी सांसदों का अनौपचारिक समूह 'समोसा कॉकस' अपना प्रभाव खो रहा है।
  • कॉकस के सदस्यों के हिंदू राइट समूहों से कथित संबंधों की जांच की जा रही है।
  • AIPAC से बढ़ते संबंधों को भी कॉकस के सिकुड़ने का एक अहम कारण बताया जा रहा है।

अमेरिकी संसद में 'समोसा कॉकस' का बदलता स्वरूप

अमेरिकी राजनीति में भारतीय-अमेरिकी समुदाय की बढ़ती उपस्थिति किसी से छिपी नहीं है। वर्षों से, अमेरिकी कांग्रेस में भारतीय मूल के सांसदों के एक अनौपचारिक समूह, जिसे प्यार से 'समोसा कॉकस' कहा जाता है, ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है। यह समूह भारतीय-अमेरिकी समुदाय के हितों और चिंताओं को उठाने में महत्वपूर्ण रहा है।

हालांकि, हाल के दिनों में इस कॉकस के प्रभाव और एकजुटता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। जानकार बताते हैं कि इसकी संख्या भले ही बढ़ी हो, लेकिन इसका राजनीतिक कद और सामुदायिक समर्थन कम होता दिख रहा है। इसके पीछे कई जटिल कारण बताए जा रहे हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख तार अमेरिका स्थित हिंदू राइट समूहों और ताकतवर AIPAC (अमेरिकन इज़राइल पब्लिक अफेयर्स कमेटी) से जुड़ते हैं।

हिंदू राइट से कथित संबंधों की छाया

अमेरिकी राजनीति में भारतीय-अमेरिकी समुदाय की भागीदारी अब पहले से कहीं अधिक है। लेकिन, इस भागीदारी के साथ आंतरिक दरारें भी सामने आई हैं। 'समोसा कॉकस' के कुछ सदस्यों पर अमेरिका में स्थित हिंदू राइट संगठनों से कथित तौर पर गहरे संबंध रखने के आरोप लगे हैं। ये ऐसे समूह हैं जिन पर भारत में सत्तारूढ़ विचारधारा के साथ निकटता का आरोप लगता है।

आलोचकों का तर्क है कि ऐसे संबंध कॉकस की विविधता और समावेशिता की छवि को धूमिल कर सकते हैं। यह भारतीय-अमेरिकी समुदाय के भीतर उन उदारवादी और प्रगतिशील वर्गों को परेशान करता है जो धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में विश्वास रखते हैं। कुछ सदस्यों के लिए ऐसे संबंध चुनावी अभियानों के लिए फंडिंग और जमीनी समर्थन का जरिया भी रहे हैं, लेकिन इसने कॉकस की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

AIPAC की भूमिका और राजनीतिक दबाव

AIPAC, जो कि अमेरिकी इज़राइल पब्लिक अफेयर्स कमेटी है, अमेरिकी राजनीति में सबसे प्रभावशाली लॉबी समूहों में से एक है। यह समूह इजराइल समर्थक नीतियों को बढ़ावा देने और उनके लिए विधायी समर्थन हासिल करने के लिए जाना जाता है। 'समोसा कॉकस' के कुछ प्रमुख सदस्यों और AIPAC के बीच बढ़ते संबंधों पर भी ध्यान गया है।

इन संबंधों के चलते, कॉकस के सदस्यों पर इज़राइल-फिलिस्तीन संघर्ष और संबंधित विदेश नीति के मुद्दों पर एक विशेष रुख अपनाने का दबाव आ सकता है। यह स्थिति उन भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं के लिए चिंता का विषय बन जाती है जो इस मुद्दे पर एक अलग या अधिक संतुलित दृष्टिकोण रखते हैं। नतीजतन, यह कॉकस के भीतर वैचारिक मतभेदों को बढ़ाता है और उसकी एकजुटता को कमजोर करता है।

💡 Did You Know? 'समोसा कॉकस' नाम 2017 में तब लोकप्रिय हुआ जब कांग्रेस में भारतीय-अमेरिकी सदस्यों की संख्या बढ़कर चार हो गई थी। इसमें पहली बार महिला सांसद कमला हैरिस भी शामिल थीं, जो बाद में उपराष्ट्रपति बनीं।

समुदाय के भीतर बढ़ती दरारें और चुनौतियाँ

भारतीय-अमेरिकी समुदाय स्वयं एक विशाल और विविधतापूर्ण समूह है। इसमें विभिन्न धर्मों, क्षेत्रों, भाषाओं और राजनीतिक विचारधाराओं के लोग शामिल हैं। हिंदू राइट और AIPAC से कथित संबंधों ने इस समुदाय के भीतर पहले से मौजूद दरारों को और गहरा कर दिया है। कॉकस के सदस्यों को अब अपने मतदाताओं के व्यापक और अक्सर विरोधाभासी विचारों को संतुलित करने में मुश्किल हो रही है।

यह स्थिति कॉकस को एक एकीकृत आवाज के रूप में प्रभावी ढंग से कार्य करने से रोकती है। सदस्य खुद को विभिन्न गुटों के बीच फंसे हुए पाते हैं, जिससे उनका सामूहिक प्रभाव कम हो जाता है। ऐसे में, 'समोसा कॉकस' के लिए अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना और भारतीय-अमेरिकी समुदाय के सभी वर्गों का विश्वास जीतना एक बड़ी चुनौती बन गया है। यह सिर्फ एक राजनीतिक समूह का सिकुड़ना नहीं, बल्कि एक बड़े समुदाय की आंतरिक जटिलताओं का प्रतिबिंब है।

अमेरिकी राजनीति में इन बदलती गतिशीलता और 'समोसा कॉकस' पर उनके प्रभावों पर गहरी नजर बनी हुई है। इस पर और अधिक जानकारी के लिए, Vews.in पर बने रहें।