अमेरिकी सेना को निशाना बनाने में ईरान की रूसी मदद की रिपोर्टों पर ट्रंप का बड़ा बयान
वाशिंगटन डीसी: संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन खुफिया रिपोर्टों को सिरे से दरकिनार कर दिया है जिनमें यह दावा किया गया था कि रूस ने ईरान को मध्य पूर्व में अमेरिकी सैनिकों को निशाना बनाने में परोक्ष रूप से मदद की थी। इन रिपोर्टों ने अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी थी और कई सांसदों ने अपनी चिंताएं व्यक्त की थीं, लेकिन ट्रंप ने इन पर संशय व्यक्त किया है।
इन गोपनीय रिपोर्टों के अनुसार, खुफिया एजेंसियों ने ऐसे संकेत दिए थे कि रूस ने ईरान समर्थित गुटों को सीरिया और इराक जैसे क्षेत्रों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला करने के लिए सहायता प्रदान की थी। ऐसी खबरें थीं कि यह सहायता विभिन्न रूपों में हो सकती है, जिसमें खुफिया जानकारी साझा करना या सैन्य सामग्री प्रदान करना शामिल है, जिससे अमेरिकी सैनिकों के लिए खतरा बढ़ गया था।
राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी प्रतिक्रिया में इन रिपोर्टों की सत्यता पर सवाल उठाया। उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्हें ऐसी कोई जानकारी नहीं मिली है या उन्होंने ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं देखी है जो इन दावों की पुष्टि करती हो। उन्होंने अक्सर रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ अपने अच्छे संबंधों का उल्लेख किया और जोर देकर कहा कि उनकी प्रशासन रूस के साथ रचनात्मक संबंध बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है। ट्रंप ने पहले भी अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की कुछ रिपोर्टों पर संदेह व्यक्त किया है, खासकर जब वे उनके प्रशासन की नीतियों या विदेशी संबंधों के विपरीत हों।
ट्रंप के इस बयान से कई विशेषज्ञों और विपक्षी राजनेताओं में चिंताएं बढ़ गई हैं। उनका मानना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा इन गंभीर खुफिया चेतावनियों को कम करके आंकना, अमेरिकी सैनिकों की सुरक्षा को खतरे में डाल सकता है और मध्य पूर्व में रूस और ईरान के प्रभाव को बढ़ने दे सकता है। कुछ सांसदों ने इस मामले की गहन जांच की मांग की है और प्रशासन से अमेरिकी सेना के जवानों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाने का आग्रह किया है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में आया है जब रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच संबंध विभिन्न भू-राजनीतिक मुद्दों, जैसे यूक्रेन युद्ध और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर तनावपूर्ण बने हुए हैं। ट्रंप का यह रुख अमेरिकी विदेश नीति और मध्य पूर्व में उसकी उपस्थिति के लिए महत्वपूर्ण निहितार्थ रखता है, क्योंकि यह भविष्य में रूस और ईरान के साथ उसके संबंधों की दिशा तय कर सकता है।