Key Highlights
- यमन में सरकारी बलों और हूती विद्रोहियों के बीच भीषण संघर्ष।
- ताजा झड़पों में कम से कम 117 लड़ाके मारे गए।
- संघर्षग्रस्त राष्ट्र में जारी अस्थिरता और हिंसा का एक और दौर।
यमन: संघर्ष की आग में झुलसा देश, 117 की मौत
यमन एक बार फिर खून-खराबे का गवाह बना है। सरकारी बलों और ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के बीच विभिन्न मोर्चों पर हुई ताजा और भीषण झड़पों में कम से कम 117 लोग मारे गए हैं। यह आंकड़ा देश में चल रहे सात साल पुराने संघर्ष की भयावहता को रेखांकित करता है। संघर्षग्रस्त क्षेत्रों से आ रही खबरें बताती हैं कि हिंसा अपने चरम पर है, और दोनों पक्षों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है।
ये झड़पें ऐसे समय में हुई हैं जब अंतरराष्ट्रीय समुदाय यमन में स्थायी शांति स्थापित करने के लिए संघर्ष विराम के प्रयासों में लगा हुआ है। हालांकि, जमीन पर हालात अलग कहानी कह रहे हैं। गोलाबारी और हवाई हमले रुकने का नाम नहीं ले रहे। हताहतों में बड़ी संख्या लड़ाकों की है, लेकिन संघर्ष के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष परिणाम हमेशा नागरिकों को भुगतने पड़ते हैं।
लंबे समय से चला आ रहा गतिरोध
यमन में संघर्ष 2014 में शुरू हुआ था, जब हूती विद्रोहियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। इसके जवाब में, सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने मार्च 2015 में यमन सरकार के समर्थन में सैन्य हस्तक्षेप शुरू किया। तब से यह संघर्ष एक जटिल क्षेत्रीय प्रॉक्सी युद्ध में बदल गया है, जिसने देश की अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे को तबाह कर दिया है।
मानवीय सहायता संगठनों ने यमन में दुनिया के सबसे बड़े मानवीय संकटों में से एक की चेतावनी दी है। लाखों लोग विस्थापन, भुखमरी और चिकित्सा सहायता की कमी का सामना कर रहे हैं। बुनियादी सेवाओं तक पहुंच लगातार मुश्किल बनी हुई है, और हालिया झड़पें स्थिति को और भी बदतर बना रही हैं।
अंतर्राष्ट्रीय प्रयास और जमीनी हकीकत
संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठन लंबे समय से यमन में संघर्ष विराम और शांति वार्ता की वकालत कर रहे हैं। कई दौर की बातचीत हुई है, लेकिन किसी स्थायी समाधान तक पहुंचने में सफलता नहीं मिली है। जमीनी हकीकत बताती है कि दोनों पक्ष अभी भी सैन्य समाधान पर जोर दे रहे हैं, जिससे संघर्ष और भी गहराता जा रहा है।
इस ताजा हिंसा से पता चलता है कि यमन में शांति अभी भी दूर की कौड़ी है। जब तक सभी पक्ष राजनीतिक समाधान के लिए ईमानदारी से प्रतिबद्ध नहीं होते, तब तक देश में अस्थिरता और लोगों की पीड़ा जारी रहने की आशंका है। इस संघर्ष के गहरे घाव भरने में लंबा समय लगेगा।
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