इश्क़ का दस्तूर
Ghazal By Furkan S Khan
Kaafiya: दिल, मुश्किल, घायल, साहिल, हासिल, क़ाबिल, मंज़िल
Radeef: अब क्या करें
जब से लगी ये आग सीने में, दिल अब क्या करें
हर साँस में बस नाम तेरा, मुश्किल अब क्या करें
तेरी नज़र का तीर जो लगा, घायल अब क्या करें
नैनों से बहते अश्क के मोती, साहिल अब क्या करें
तेरी यादों में खोए रहते हैं, हासिल अब क्या करें
दुनिया की हर रस्म-ओ-रिवाज, क़ाबिल अब क्या करें
'फ़ुरकान' कहाँ जाए अब छोड़ के, मंज़िल अब क्या करें
तेरी ही गली में अपना ठिकाना, साहिल अब क्या करें
हर साँस में बस नाम तेरा, मुश्किल अब क्या करें
तेरी नज़र का तीर जो लगा, घायल अब क्या करें
नैनों से बहते अश्क के मोती, साहिल अब क्या करें
तेरी यादों में खोए रहते हैं, हासिल अब क्या करें
दुनिया की हर रस्म-ओ-रिवाज, क़ाबिल अब क्या करें
'फ़ुरकान' कहाँ जाए अब छोड़ के, मंज़िल अब क्या करें
तेरी ही गली में अपना ठिकाना, साहिल अब क्या करें
Ghazal By Furkan S Khan
Kaafiya: सौग़ात, बात, साथ, रात, याद, मुराद
Radeef: आती है
जब याद तेरी दिल में, बनके एक सौग़ात आती है
हर साँस में बस तेरी ही अब तो बात आती है
अंधेरी शब में भी, रौशनी सी साथ आती है
तेरी हँसी की गूँज, कानों में जब रात आती है
क्या बताऊँ हाल-ए-दिल, जब तू न पास आती है
हर आरज़ू अधूरी, हर दुआ तब याद आती है
'फ़ुरकान' की हर ग़ज़ल में, तेरा ही ज़िक्र रहता है
जब लबों पे तेरा नाम, एक मुराद बनके आती है
हर साँस में बस तेरी ही अब तो बात आती है
अंधेरी शब में भी, रौशनी सी साथ आती है
तेरी हँसी की गूँज, कानों में जब रात आती है
क्या बताऊँ हाल-ए-दिल, जब तू न पास आती है
हर आरज़ू अधूरी, हर दुआ तब याद आती है
'फ़ुरकान' की हर ग़ज़ल में, तेरा ही ज़िक्र रहता है
जब लबों पे तेरा नाम, एक मुराद बनके आती है