उदासी का आलम
Ghazal By Furkan S Khan
Kaafiya: खुशी, हँसी, कमी, सभी, रिहाई
Radeef: नहीं
इस दिल में अब कोई भी खुशी नहीं,
आँखों में अब वो पहली हँसी नहीं।
हर मोड़ पर मिली है बस कमी,
जीवन में अब कोई भी खुशी नहीं।
वो दिन गए जब रौशनी थी हरसू,
अब रात काली, सुबह भी हँसी नहीं।
हर शख्स के चेहरे पे एक नक़ाब है,
कहने को तो अपने हैं, पर कोई भी नहीं।
'फ़ुरकान' ये ग़म अब तेरा मुक़द्दर है,
इस दर्द से अब कोई रिहाई नहीं।
आँखों में अब वो पहली हँसी नहीं।
हर मोड़ पर मिली है बस कमी,
जीवन में अब कोई भी खुशी नहीं।
वो दिन गए जब रौशनी थी हरसू,
अब रात काली, सुबह भी हँसी नहीं।
हर शख्स के चेहरे पे एक नक़ाब है,
कहने को तो अपने हैं, पर कोई भी नहीं।
'फ़ुरकान' ये ग़म अब तेरा मुक़द्दर है,
इस दर्द से अब कोई रिहाई नहीं।
Ghazal By Furkan S Khan
Kaafiya: मिला, चला, रहा, वफ़ा, सज़ा
Radeef: क्या
जो चाहा वो कभी हमको मिला क्या?
बस दर्द का ही सिलसिला चला क्या?
हर साँस पे एक बोझ सा रहता है,
इस दिल को कभी चैन से मिला क्या?
वो रातें जो गुज़रीं तेरी याद में,
उनका कोई भी हिसाब रहा क्या?
ये दुनिया कहती है वफ़ा यहाँ है,
पर हमने तो बस धोखा ही लिया क्या?
'फ़ुरकान' ये कैसी है तेरी दुनिया,
जहाँ हर कदम पर है सज़ा, भला क्या?
बस दर्द का ही सिलसिला चला क्या?
हर साँस पे एक बोझ सा रहता है,
इस दिल को कभी चैन से मिला क्या?
वो रातें जो गुज़रीं तेरी याद में,
उनका कोई भी हिसाब रहा क्या?
ये दुनिया कहती है वफ़ा यहाँ है,
पर हमने तो बस धोखा ही लिया क्या?
'फ़ुरकान' ये कैसी है तेरी दुनिया,
जहाँ हर कदम पर है सज़ा, भला क्या?
Ghazal By Furkan S Khan
Kaafiya: उदासी, प्यासी, ख़ामोशी, रास
Radeef: है
हर एक लम्हे में अब उदासी है,
ये आँखें किसी की याद में प्यासी है।
लबों पर अब कोई बात नहीं आती,
दिल में गहरी सी एक ख़ामोशी है।
न जाने किसकी तलाश में भटकते हैं,
हर राह पर एक नई उदासी है।
वो कहते हैं कि हम खुश रहते हैं,
पर अंदर ही अंदर एक उदासी है।
'फ़ुरकान' ये कैसा तेरा मुक़द्दर है,
जहाँ हर साँस पर एक उदासी है।
ये आँखें किसी की याद में प्यासी है।
लबों पर अब कोई बात नहीं आती,
दिल में गहरी सी एक ख़ामोशी है।
न जाने किसकी तलाश में भटकते हैं,
हर राह पर एक नई उदासी है।
वो कहते हैं कि हम खुश रहते हैं,
पर अंदर ही अंदर एक उदासी है।
'फ़ुरकान' ये कैसा तेरा मुक़द्दर है,
जहाँ हर साँस पर एक उदासी है।