रिश्तों का खामोश क़ातिल
सोशल मीडिया की चकाचौंध भरी दुनिया में असल ज़िंदगी की सच्चाई को उजागर करता एक भावनात्मक और विचारशील लेख।
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आजकल सोशल मीडिया ने हमें ऐसी ज़िंदगी दिखा दी है कि जहाँ हर कोई अपनी ज़िंदगी का सबसे चमकीला हिस्सा पेश करता है।
खूबसूरत कपड़े, महंगे गिफ्ट्स, फ़िल्टर लगी मुस्कानें, कार की सवारी, आईफ़ोनवगैरह वगैरह।
इंस्टाग्राम और फ़ेसबुक की दुनिया मे हर कोई अपनी ज़िंदगी का सबसे चमकीला हिस्सा दिखाता है।
खूबसूरत तस्वीरें, गिफ्ट्स, ट्रिप, स्टोरीज़......
लेकिन, हक़ीक़त यह है कि यह सब एक "edited reality "है,
जहाँ दुःख, खामोशी, गलतफहमियां और थकावट दिखाई नहीं जाती। आजकल हम खुश रहने से ज़्यादा खुश दिखने में लगे हुए हैं!
जब हम हर रोज़ इंस्टाग्राम और फ़ेसबुक पर दूसरों की ज़िंदगी के "highlighted movements" देखते हैं तो अनजाने में अपनी और अपने रिश्ते की तुलना उनसे करने लगते हैं।
और फिर पैदा होती है jealousy (ईर्ष्या) जो इंसान को भीतर से जला देती है। वह इंसान जो पहले आपसे खुश होता था वह अप्स अब ईर्ष्या करने लगता है।
यह मानना बहुत ज़रूरी है कि इंसान का स्टेटस उसके सोशल मीडिया स्टेटस से नहीं मापा जाना चाहिए।
इंसान की असली हैसियत और उसका स्टेटस उसके किरदार, दिमाग़ और सोंच में होती है जो समाज में एक पॉज़िटिव बदलाव लाती है।
लोगों की मदद करें, शांति, समझदारी और इंसानियत फैलाने में लगाएं।
क्योंकि दिखावे की चमक सिर्फ कुछ वक्त के लिए होती है लेकिन अच्छी सोंच और अच्छे कर्म दूर तलक जाते हैं।
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पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी
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