यह कविता 'ईर्ष्या' के विनाशकारी प्रभाव को दर्शाती है। कवि बताता है कि कैसे ईर्ष्या की आग जब मन में सुलगती है, तो दूसरों की खुशी भी काँटों की तरह चुभने लगती है। यह एक गहरा कुआँ है जिसे व्यक्ति अपने भीतर ही खोदता है, और अंततः अपने ही सुख-चैन को उसमें डुबो देता है। ईर्ष्या एक ज़हरीले भाव की तरह है जो जीवन की हर कली को, हर खुशी को जला देता है, और हर रंगीन पल को एक गहरे घाव में बदल देता है। यह कविता हमें इस नकारात्मक भावना से बचने और आंतरिक शांति व संतोष प्राप्त करने की प्रेरणा देती है। यह हमें सिखाती है कि दूसरों की सफलता से जलने के बजाय, हमें अपनी ऊर्जा को अपने विकास और खुशियों पर केंद्रित करना चाहिए। ईर्ष्या केवल व्यक्ति को भीतर से खोखला करती है और उसे कभी वास्तविक सुख नहीं देती।

यह कविता 'ईर्ष्या' के विनाशकारी प्रभाव को दर्शाती है। कवि बताता है कि कैसे ईर्ष्या की आग जब मन में सुलगती है, तो दूसरों की खुशी भी काँटों की तरह चुभने लगती है। यह एक गहरा कुआँ है जिसे व्यक्ति अपने भीतर ही खोदता है, और अंततः अपने ही सुख-चैन को उसमें डुबो देता है। ईर्ष्या एक ज़हरीले भाव की तरह है जो जीवन की हर कली को, हर खुशी को जला देता है, और हर रंगीन पल को एक गहरे घाव में बदल देता है। यह कविता हमें इस नकारात्मक भावना से बचने और आंतरिक शांति व संतोष प्राप्त करने की प्रेरणा देती है। यह हमें सिखाती है कि दूसरों की सफलता से जलने के बजाय, हमें अपनी ऊर्जा को अपने विकास और खुशियों पर केंद्रित करना चाहिए। ईर्ष्या केवल व्यक्ति को भीतर से खोखला करती है और उसे कभी वास्तविक सुख नहीं देती।