मुख्य बातें

  • सोशल मीडिया पर नेपाल बाढ़ के दौरान 4000 साल पुराने शालिग्राम मिलने के दावे भ्रामक निकले।
  • कई मीडिया रिपोर्टों और तथ्य-जांच में यह दावा फर्जी पाया गया है।
  • शालिग्राम पत्थर प्राकृतिक रूप से लाखों साल पुराने होते हैं, न कि हजारों साल पुराने, और ये नेपाल की गंडकी नदी में सदियों से पाए जाते रहे हैं।

नेपाल में '4000 साल पुराने शालिग्राम' मिलने का दावा फर्जी

नेपाल में हाल ही में आई भीषण बाढ़ के बीच सोशल मीडिया पर एक दावा तेजी से वायरल हुआ। इसमें कहा गया कि बाढ़ के दौरान 4000 साल पुराने 'शालिग्राम' पत्थर पाए गए हैं। इन दावों को कई वीडियो और तस्वीरों के साथ साझा किया गया, जिससे लोगों में उत्सुकता और भ्रम फैल गया। हालांकि, जब Vews.in की टीम ने इस दावे की गहन पड़ताल की, तो सच्चाई कुछ और ही सामने आई। यह दावा पूरी तरह भ्रामक निकला।

विशेषज्ञों और तथ्य-जांचकर्ताओं ने पुष्टि की है कि वायरल हो रहा यह दावा गलत है। '4000 साल पुराने' शालिग्राम मिलने की बात में कोई सच्चाई नहीं है। यह केवल सोशल मीडिया पर चल रहा एक अफवाह है, जिसका कोई ठोस वैज्ञानिक या पुरातात्विक आधार नहीं है।

सोशल मीडिया पर तेजी से फैला भ्रम

बाढ़ के बाद जब कई नदियां उफान पर थीं और उनका जलस्तर बढ़ा हुआ था, तभी कुछ लोगों ने दावा किया कि उन्हें गंडकी नदी के किनारों पर या अन्य जलस्रोतों में विशाल शालिग्राम पत्थर मिले हैं। इन दावों को बिना किसी पुष्टि के इंटरनेट पर साझा किया गया। देखते ही देखते ये वीडियो और पोस्ट हजारों लोगों तक पहुंच गए, जिससे गलत सूचना का प्रसार हुआ। लोग इसे चमत्कार या किसी धार्मिक महत्व की घटना मान रहे थे।

हालांकि, इन वीडियो में दिख रहे पत्थर शालिग्राम जैसे ही लग सकते हैं, पर उनकी '4000 साल पुराने' होने की बात पूरी तरह मनगढ़ंत है। कई बार पुराने वीडियो या तस्वीरें भी नए संदर्भों में साझा की जाती हैं, जिससे भ्रम और बढ़ता है।

💡 Did You Know? शालिग्राम पत्थर भूवैज्ञानिक रूप से 'अमोनाइट' जीवाश्म होते हैं। ये लाखों साल पुराने समुद्री जीव हैं, जो अब पत्थर में बदल चुके हैं। इनका निर्माण हजारों साल पहले नहीं, बल्कि करोड़ों साल पहले हुआ था।

शालिग्राम की वास्तविक पहचान और महत्व

शालिग्राम पत्थर हिंदू धर्म में अत्यंत पूजनीय माने जाते हैं, विशेषकर वैष्णव संप्रदाय में। इन्हें भगवान विष्णु का निराकार स्वरूप माना जाता है। ये पत्थर प्राकृतिक रूप से नेपाल की गंडकी नदी में पाए जाते हैं। इनकी भूवैज्ञानिक आयु हजारों साल नहीं, बल्कि लाखों से करोड़ों साल तक हो सकती है। ये जीवाश्म (fossils) होते हैं, जो प्राचीन समुद्री जीवन के अवशेष हैं।

बाढ़ के दौरान नदियों में जलस्तर बढ़ने से कई ऐसे पत्थर सतह पर आ जाते हैं, जिन्हें लोग 'नया' समझ लेते हैं। लेकिन ये हमेशा से वहां मौजूद रहे होते हैं, बस जलधारा के कटाव या बहाव से उजागर हो जाते हैं।

जांच में क्या निकला?

कई विश्वसनीय तथ्य-जांच संगठनों और प्रमुख समाचार पोर्टलों ने इस दावे की पड़ताल की। उन्होंने पाया कि वायरल वीडियो अक्सर पुराने होते हैं या उनमें दिख रहे पत्थरों की वास्तविक आयु को बढ़ा-चढ़ाकर बताया जा रहा है। न तो कोई पुरातात्विक सर्वेक्षण और न ही कोई भूवैज्ञानिक अध्ययन इस '4000 साल पुराने' शालिग्राम की खोज की पुष्टि करता है। यह केवल एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जहां पुराने पत्थर पानी के बहाव से दिखने लगते हैं।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि प्राकृतिक आपदाओं के दौरान ऐसी भ्रामक खबरों का प्रसार आम हो जाता है। हमेशा सत्यापित स्रोतों से जानकारी की पुष्टि करना आवश्यक है। ऐसी अफवाहें केवल भय और भ्रम पैदा करती हैं।

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