जीवन की पहेली
Ghazal — By Furkan S Khan
Kaafiya: दास्ताँ, यहाँ, जहाँ, निशाँ, इम्तिहाँ, फ़ना | Radeef: है
जीवन ये क्या है, इक अनकही दास्ताँ है।
हर साँस में छुपी, इक नई कहानी यहाँ है।
कभी धूप है, कभी छाँव, कभी ये बहती हवा है।
हर पल बदलता रंग, ये कैसा करिश्मा-ए-जहाँ है।
जो आज है मेरा, कल शायद वो किसी और का है।
इस फ़ानी दुनिया में, हर चीज़ ही तो बे-निशाँ है।
मिलते हैं लोग यहाँ, बिछड़ जाते हैं फिर कहीं।
रिश्तों का ये जाल, कैसा अजीब इम्तिहाँ है।
ना कोई ठहरता यहाँ, ना कोई रुकता सदा।
वक़्त की तेज़ धार में, हर लम्हा भी तो फ़ना है।
Ghazal — By Furkan S Khan
Kaafiya: सफ़र, असर, ख़बर, नज़र, गुज़र, हुनर, शजर, बशर | Radeef: चल रहा है
ये ज़िंदगी का कैसा अजीब सा सफ़र चल रहा है।
हर मोड़ पर नई मंज़िल, हर पल नया असर चल रहा है।
कभी खुशी की लहर, कभी ग़म की गहरी ख़बर चल रहा है।
इस राह पर कहाँ ठहराव, बस आगे ही नज़र चल रहा है।
जो बीत गया वो लम्हा, वो फिर कभी ना गुज़र चल रहा है।
हर साँस में इक नई उम्मीद, ये दिल का हुनर चल रहा है।
कितने ही ख्वाब बुने, कितने ही टूट गए पल में।
फिर भी टूटे ख्वाबों से, इक नया शजर चल रहा है।
ये वक़्त की रफ़्तार है, या ये मेरी तक़दीर का है।
हर आहट में, हर लम्हे में, मेरा ही बशर चल रहा है।