फुरकान एस खान की उदासी पर क़िता: अकेलापन

फुरकान एस खान द्वारा रचित 'अकेलापन' शीर्षक से एक हृदयस्पर्शी क़िता। यह कविता गहरे दर्द और खामोशी में डूबे अकेलेपन का वर्णन करती है, जो टूटे ख्वाबों की रस्म सी बन गई है।

Tuesday, September 15, 2026
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फुरकान एस खान की उदासी पर क़िता: अकेलापन
“फुरकान एस खान की उदासी पर क़िता: अकेलापन”
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Date
15 September 2026
Qita — By Furkan S Khan
दिल में एक दर्द गहरा, आँखें नम सी रहती हैं, ज़िंदगी की हर कहानी, अब बेगम सी रहती है। खामोशी में डूबा रहता, हर पल मेरा आजकल, जैसे टूटे हुए ख्वाबों की, कोई रस्म सी रहती है।
Qita — By Furkan S Khan
कौन समझे मेरे दिल का, ये सूनापन कैसा है, भीड़ में भी अकेला हूँ, ये पागलपन कैसा है। हर खुशी मुझ से दूर भागे, हर गम गले लगता है, ज़िंदगी का ये अजीब सा, अपनापन कैसा है।
Qita — By Furkan S Khan
जब से टूटे हैं सपने, दिल में उदासी छाई है, हर तरफ बस मायूसी, हर ओर तन्हाई है। रोशनी भी अब चुभती है, अँधेरा प्यारा लगता है, लगता है जैसे किस्मत ने, मुझसे जंग ठानी है।

नम: गीली, उदास। बेगम: बिना साथी के, अकेली। रस्म: रीति, परंपरा, यहाँ अर्थ है कि जैसे टूटे ख्वाबों की उदासी एक परंपरा बन गई है।

सूनापन: खालीपन, अकेलापन। पागलपन: दीवानगी, अजीब व्यवहार, यहाँ अकेलापन महसूस करने की अजीब स्थिति। अपनापन: किसी चीज़ का अपना होना, यहाँ व्यंग्यात्मक रूप से दर्द को अपना बताया गया है।

मायूसी: निराशा, हताशा। तन्हाई: अकेलापन। जंग ठानी: मुकाबला करना, चुनौती देना, यहाँ अर्थ है कि किस्मत ने व्यक्ति के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

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Zainab
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