प्रकृति की गोद में यादों के हरे निशान - Furkan S Khan की हिन्दी कविता

Furkan S Khan की यह सुन्दर हिन्दी कविता प्रकृति और बचपन की यादों के गहरे सम्बन्ध को दर्शाती है। बहती नदी, ऊँचे पेड़ और पहाड़ों की खामोशी में छिपी अनमोल यादों को महसूस करें और अपने गुजरे पलों को याद करें।

Monday, September 21, 2026
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प्रकृति की गोद में यादों के हरे निशान - Furkan S Khan की हिन्दी कविता
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21 September 2026
प्रकृति की गोद में यादों के हरे निशान - Furkan S Khan की हिन्दी कविता
Nature Poetry — By Furkan S Khan
बहती नदी की हर लहर में, एक पुरानी कहानी है, पत्तों की सरसराहट में, बीती हुई जवानी है। उस ऊँचे पेड़ की छाँव तले, हमने सपने बुने थे, मिट्टी की सौंधी खुशबू में, अनकहे बोल सुने थे। सूरज की सुनहरी किरणें, अब भी वही चमकती हैं, पर उन राहों पर चलने वाले, अब कहाँ दिखते हैं? पहाड़ों की खामोशी में, गूँजती हैं वो आवाज़ें, जो कभी संग हँसती थीं, अब बस दिल में समाई हैं। हर फूल में वो मुस्कान, हर हवा में वो एहसास, प्रकृति की गोद में सिमटा, मेरा गुजरा हुआ हर खास। ये झरने, ये वादियाँ, सब यादों के संग्रहालय हैं, जहाँ हर पल ठहरा है, कोई भूला हुआ कल है। और जब शाम ढले, तारों भरी रात आए, हर बूँद शबनम की, एक नया किस्सा सुनाए।
Nature Poetry — By Furkan S Khan
ये खामोश जंगल, ये गहरे सन्नाटे, कितने अनमोल पल, यहाँ आकर सिमटे। हर टहनी की छाँव में, एक चेहरा छुपा है, हर पत्ती की सरसराहट में, कोई नाम बुना है। वो ढलती हुई शामें, वो सुनसान रास्ते, कैसे भूलूँ मैं वो, तुम्हारे संग के वास्ते? हवाओं में घुलती है, पुरानी सी आहट, लगता है जैसे तुम, यहीं हो कहीं पास। आसमान की नीलिमा, यादों का दरिया है, जहाँ चाँद-सितारों संग, बहता मेरा मन पिया है। ये मिट्टी, ये पत्थर, सब गवाह हैं मेरे, उन अनमोल लम्हों के, जो गुजरे थे तेरे। प्रकृति की हर अदा में, वो बीते दिन ज़िंदा हैं, हर आहट, हर आह में, मेरे अश्क शर्मिंदा हैं। यहीं तो मिलती है, उन यादों को पनाह, जहाँ दिल को सुकून मिले, और मिले राहत की राह।
Nature Poetry — By Furkan S Khan
जब बसंत आए, फूलों की खुशबू छाए, बचपन की वो शरारतें, मन को फिर बहलाए। गर्मी की तपती धूप में, वो खेल-कूद के दिन, दोस्तों की टोली संग, बेफिक्री के रंगीन। पतझड़ जब दस्तक दे, सूखे पत्तों की आवाज़, कुछ बिछड़े हुए लम्हों का, होता है फिर एहसास। सर्द रातों में, अलाव की धीमी आंच, याद आती है वो बातें, जो बुझती नहीं आज। हर मौसम के साथ, इक नई याद जुड़ती है, प्रकृति की हर अदा, अतीत को छू कर मुड़ती है। ये बारिश की बूँदें, ये हवा का हर झोंका, दिल के किसी कोने में, देता है वो धोखा। कि सब कुछ बदल गया, पर यादें कहाँ गईं? वो तो इन वादियों में, आज भी कहीं थमीं। जैसे सूरज की किरणें, हर सुबह आती हैं, वैसे ही यादें भी, जीवन को महकाती हैं।

सरसराहट: पत्तों की हल्की आवाज़। सौंधी: मिट्टी की ताज़ी, भीगी हुई खुशबू। अनकहे: जो कहे न गए हों। गूँजती: आवाज़ का बार-बार सुनाई देना। समाई: अंदर बस जाना। एहसास: अनुभव, महसूस करना। संग्रहालय: जहाँ पुरानी चीज़ें रखी जाती हैं। शबनम: ओस की बूँदें।

सन्नाटे: गहरी चुप्पी। सिमटे: इकठ्ठे हुए, समाए हुए। वास्ते: के लिए, कारण। आहट: किसी के आने की हल्की ध्वनि। नीलिमा: नीले रंग का फैलाव, नीलापन। दरिया: नदी, सागर। पिया: यहाँ मन के लिए उपयोग हुआ है, 'मन रूपी पिया'। गवाह: साक्षी। अश्क: आँसू। शर्मिंदा: लज्जित। पनाह: आश्रय, शरण। राहत: आराम, चैन।

शरारतें: नटखट हरकतें। बहलाए: मन को खुश करे। तपती: बहुत गरम। बेफिक्री: चिंता रहित। पतझड़: वो मौसम जब पेड़ अपने पत्ते गिराते हैं। दस्तक दे: दरवाज़ा खटखटाना, यहाँ अर्थ है 'आना'। बिछड़े: अलग हुए। अलाव: आग का ढेर, खासकर ठंड में तापने के लिए। झोंका: हवा का तेज़ बहाव। धोखा: भ्रम, छल। वादियाँ: घाटियाँ। थमीं: रुकी हुईं। महकाती: सुगंधित करती हैं, खुशबू फैलाती हैं।

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Mahira Noor
संपादक

A passionate poet who weaves emotions into beautiful words. Writing about love, heartbreak, dreams, and life, one verse at a time.

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