प्रकृति की गोद में यादों के हरे निशान - Furkan S Khan की हिन्दी कविता
Furkan S Khan की यह सुन्दर हिन्दी कविता प्रकृति और बचपन की यादों के गहरे सम्बन्ध को दर्शाती है। बहती नदी, ऊँचे पेड़ और पहाड़ों की खामोशी में छिपी अनमोल यादों को महसूस करें और अपने गुजरे पलों को याद करें।
सरसराहट: पत्तों की हल्की आवाज़। सौंधी: मिट्टी की ताज़ी, भीगी हुई खुशबू। अनकहे: जो कहे न गए हों। गूँजती: आवाज़ का बार-बार सुनाई देना। समाई: अंदर बस जाना। एहसास: अनुभव, महसूस करना। संग्रहालय: जहाँ पुरानी चीज़ें रखी जाती हैं। शबनम: ओस की बूँदें।
सन्नाटे: गहरी चुप्पी। सिमटे: इकठ्ठे हुए, समाए हुए। वास्ते: के लिए, कारण। आहट: किसी के आने की हल्की ध्वनि। नीलिमा: नीले रंग का फैलाव, नीलापन। दरिया: नदी, सागर। पिया: यहाँ मन के लिए उपयोग हुआ है, 'मन रूपी पिया'। गवाह: साक्षी। अश्क: आँसू। शर्मिंदा: लज्जित। पनाह: आश्रय, शरण। राहत: आराम, चैन।
शरारतें: नटखट हरकतें। बहलाए: मन को खुश करे। तपती: बहुत गरम। बेफिक्री: चिंता रहित। पतझड़: वो मौसम जब पेड़ अपने पत्ते गिराते हैं। दस्तक दे: दरवाज़ा खटखटाना, यहाँ अर्थ है 'आना'। बिछड़े: अलग हुए। अलाव: आग का ढेर, खासकर ठंड में तापने के लिए। झोंका: हवा का तेज़ बहाव। धोखा: भ्रम, छल। वादियाँ: घाटियाँ। थमीं: रुकी हुईं। महकाती: सुगंधित करती हैं, खुशबू फैलाती हैं।
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